श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

वाचा मधुरया प्रीणन्‍निदमाहान्‍नतर्पितान्।

पादावंकगतौ विष्णोः संस्पृशञ्छनकैर्मुदा॥ ३०

vācā madhurayā prīṇannidamāhānnatarpitān|

pādāvaṃkagatau viṣṇoḥ saṃspṛśañchanakairmudā|| 30

अर्थ

जब सब लोग भोजन करके तृप्त हो गये, तब राजा बहुलाश्‍व भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर बैठ गये। और बड़े आनन्दसे धीरे-धीरे उन्हें सहलाते हुए बड़ी मधुर वाणीसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ३०॥

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