॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.15
यात्रामात्रं त्वहरहर्दैवादुपनमत्युत२।
नाधिकं तावता तुष्टः क्रियाश्चक्रे यथोचिताः॥ १५
yātrāmātraṃ tvaharahardaivādupanamatyuta|
nādhikaṃ tāvatā tuṣṭaḥ kriyāścakre yathocitāḥ|| 15
अर्थ
प्रारब्धवश प्रतिदिन उन्हें जीवन-निर्वाहभरके लिये सामग्री मिल जाया करती थी, अधिक नहीं। वे उतनेसे ही सन्तुष्ट भी थे, और अपने वर्णाश्रमके अनुसार धर्म-पालनमें तत्पर रहते थे॥ १५॥
टिप्पणियाँ
- २
मत्ययम्।