वे गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी किसी प्रकारका उद्योग नहीं करते थे; जो कुछ मिल जाता, उसीसे अपना निर्वाह कर लेते थे॥ १४॥
स उवास विदेहेषु मिथिलायां गृहाश्रमी।
अनीहयाऽऽगताहार्यनिर्वर्तितनिजक्रियः ॥ १४
वे गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी किसी प्रकारका उद्योग नहीं करते थे; जो कुछ मिल जाता, उसीसे अपना निर्वाह कर लेते थे॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 661) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/14/