अतः हम अपनी माताका शोक दूर करनेके लिये इन्हें यहाँसे ले जायँगे। इसके बाद ये शापसे मुक्त हो जायँगे और आनन्दपूर्वक अपने लोकमें चले जायँगे॥ ५०॥✎ 1719
इत एतान् प्रणेष्यामो मातृशोकापनुत्तये।
ततः शापाद् विनिर्मुक्ता लोकं यास्यन्ति विज्वराः॥ ५०
अतः हम अपनी माताका शोक दूर करनेके लिये इन्हें यहाँसे ले जायँगे। इसके बाद ये शापसे मुक्त हो जायँगे और आनन्दपूर्वक अपने लोकमें चले जायँगे॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 658) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)