श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

देवक्या उदरे जाता राजन् कंसविहिंसिताः।

सा ताञ्छोचत्यात्मजान् स्वांस्त इमेऽध्यासतेऽन्तिके॥ ४९

devakyā udare jātā rājan kaṃsavihiṃsitāḥ|

sā tāñchocatyātmajān svāṃsta ime'dhyāsate'ntike|| 49

अर्थ

इस परिहासरूप अपराधके कारण उन्हें ब्रह्माजीने शाप दे दिया और वे असुरयोनिमें हिरण्यकशिपुके पुत्ररूपसे उत्पन्‍न हुए। अब योगमायाने उन्हें वहाँसे लाकर देवकीके गर्भमें रख दिया और उनको उत्पन्‍न होते ही कंसने मार डाला। दैत्यराज! माता देवकीजी अपने उन पुत्रोंके लिये अत्यन्त शोकातुर हो रही हैं और वे तुम्हारे पास हैं॥ ४८-४९॥✎ 1719

यह अर्थ श्लोक 48–49 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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