श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

स इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्बुजं

बिभ्रन्मुहुः प्रेमविभिन्‍नया धिया।

उवाच हानन्दजलाकुलेक्षणः

प्रहृष्टरोमा नृप गद्गदाक्षरम्॥ ३८

sa indraseno bhagavatpadāmbujaṃ

bibhranmuhuḥ premavibhinnayā dhiyā|

uvāca hānandajalākulekṣaṇaḥ

prahṛṣṭaromā nṛpa gadgadākṣaram|| 38

अर्थ

परीक्षित्! दैत्यराज बलि बार-बार भगवान्‌के चरणकमलोंको अपने वक्षःस्थल और सिरपर रखने लगे, उनका हृदय प्रेमसे विह्वल हो गया। नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगे। रोम-रोम खिल उठा। अब वे गद्गद स्वरसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ३८॥

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