॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.37
समर्हयामास स तौ विभूतिभि-
र्महार्हवस्त्राभरणानुलेपनैः ।
ताम्बूलदीपामृतभक्षणादिभिः
स्वगोत्रवित्तात्मसमर्पणेन च॥ ३७
samarhayāmāsa sa tau vibhūtibhi-
rmahārhavastrābharaṇānulepanaiḥ |
tāmbūladīpāmṛtabhakṣaṇādibhiḥ
svagotravittātmasamarpaṇena ca|| 37
अर्थ
इसके बाद दैत्यराज बलिने बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, चन्दन, ताम्बूल, दीपक, अमृतके समान भोजन एवं अन्य विविध सामग्रियोंसे उनकी पूजा की और अपने समस्त परिवार, धन तथा शरीर आदिको उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ ३७॥