॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.13
सत्त्वं रजस्तम इति गुणास्तद्वृत्तयश्च याः।
त्वय्यद्धा ब्रह्मणि परे कल्पिता योगमायया॥ १३
sattvaṃ rajastama iti guṇāstadvṛttayaśca yāḥ|
tvayyaddhā brahmaṇi pare kalpitā yogamāyayā|| 13
अर्थ
प्रभो! सत्त्व, रज, तम—ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ (परिणाम)—महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मामें, तुममें योगमायाके द्वारा कल्पित हैं॥ १३॥