श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति गुणास्तद‍्वृत्तयश्‍च याः।

त्वय्यद्धा ब्रह्मणि परे कल्पिता योगमायया॥ १३

sattvaṃ rajastama iti guṇāstadvṛttayaśca yāḥ|

tvayyaddhā brahmaṇi pare kalpitā yogamāyayā|| 13

अर्थ

प्रभो! सत्त्व, रज, तम—ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ (परिणाम)—महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मामें, तुममें योगमायाके द्वारा कल्पित हैं॥ १३॥

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