श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

नश्‍वरेष्विह भावेषु तदसि त्वमनश्‍वरम्।

यथा द्रव्यविकारेषु द्रव्यमात्रं निरूपितम्॥ १२

naśvareṣviha bhāveṣu tadasi tvamanaśvaram|

yathā dravyavikāreṣu dravyamātraṃ nirūpitam|| 12

अर्थ

भगवन्! जैसे मिट्टी आदि वस्तुओंके विकार घड़ा, वृक्ष आदिमें मिट्टी निरन्तर वर्तमान है और वास्तवमें वे कारण (मृत्तिका) रूप ही हैं—उसी प्रकार जितने भी विनाशवान् पदार्थ हैं, उनमें तुम कारणरूपसे अविनाशी तत्त्व हो। वास्तवमें वे सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं॥ १२॥

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