नन्दबाबा, गोपों और गोपियोंका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलोंमें इस प्रकार लग गया कि वे फिर प्रयत्न करनेपर भी उसे वहाँसे लौटा न सके। सुतरां बिना ही मनके उन्होंने मथुराकी यात्रा की॥ ६९॥
नन्दो गोपाश्च गोप्यश्च गोविन्दचरणाम्बुजे।
मनः क्षिप्तं पुनर्हर्तुमनीशा मथुरां ययुः॥ ६९
नन्दबाबा, गोपों और गोपियोंका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलोंमें इस प्रकार लग गया कि वे फिर प्रयत्न करनेपर भी उसे वहाँसे लौटा न सके। सुतरां बिना ही मनके उन्होंने मथुराकी यात्रा की॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 651) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/69/