श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.69

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

नन्दो गोपाश्‍च गोप्यश्‍च गोविन्दचरणाम्बुजे।

मनः क्षिप्तं पुनर्हर्तुमनीशा मथुरां ययुः॥ ६९

nando gopāśca gopyaśca govindacaraṇāmbuje|

manaḥ kṣiptaṃ punarhartumanīśā mathurāṃ yayuḥ|| 69

अर्थ

नन्दबाबा, गोपों और गोपियोंका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलोंमें इस प्रकार लग गया कि वे फिर प्रयत्‍न करनेपर भी उसे वहाँसे लौटा न सके। सुतरां बिना ही मनके उन्होंने मथुराकी यात्रा की॥ ६९॥

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