श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

द्वितस्त्रितश्‍चैकतश्‍च ब्रह्मपुत्रास्तथांगिराः।

अगस्त्यो याज्ञवल्क्यश्‍च वामदेवादयोऽपरे ॥ ५

dvitastritaścaikataśca brahmaputrāstathāṃgirāḥ|

agastyo yājñavalkyaśca vāmadevādayo'pare || 5

अर्थ

उनमें प्रधान ये थे—श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, च्यवन, देवल, असित, विश्‍वामित्र, शतानन्द, भरद्वाज, गौतम, अपने शिष्योंके सहित भगवान् परशुराम, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पुलस्त्य, कश्यप, अत्रि, मार्कण्डेय, बृहस्पति, द्वित, त्रित, एकत, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, अंगिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य और वामदेव इत्यादि॥ ३—५॥

यह अर्थ श्लोक 3–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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