श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तन्महिष्यश्‍च मुदिता निष्ककण्ठ्यः सुवाससः।

दीक्षाशालामुपाजग्मुरालिप्ता वस्तुपाणयः॥ ४५

tanmahiṣyaśca muditā niṣkakaṇṭhyaḥ suvāsasaḥ|

dīkṣāśālāmupājagmurāliptā vastupāṇayaḥ|| 45

अर्थ

वसुदेवजीकी पत्‍नियोंने सुन्दर वस्त्र, अंगराग और सोनेके हारोंसे अपनेको सजा लिया और फिर वे सब बड़े आनन्दसे अपने-अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर यज्ञशालामें आयीं॥ ४५॥

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