श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

ऋणैस्त्रिभिर्द्विजो जातो देवर्षिपितृणां प्रभो।✎ 1197

यज्ञाध्ययनपुत्रैस्तान्यनिस्तीर्य त्यजन् पतेत्॥ ३९

ṛṇaistribhirdvijo jāto devarṣipitṛṇāṃ prabho|

yajñādhyayanaputraistānyanistīrya tyajan patet|| 39

अर्थ

समर्थ वसुदेवजी! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण लेकर ही पैदा होते हैं। इनके ऋणोंसे छुटकारा मिलता है यज्ञ, अध्ययन और सन्तानोत्पत्तिसे। इनसे उऋण हुए बिना ही जो संसारका त्याग करता है, उसका पतन हो जाता है॥ ३९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1197 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): देवर्षिपितॄणां → देवर्षिपितृणां

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