श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

कर्मणा कर्मनिर्हार एष साधु निरूपितः।

यच्छ्रद्धया यजेद् विष्णुं सर्वयज्ञेश्‍वरं मखैः॥ ३५

karmaṇā karmanirhāra eṣa sādhu nirūpitaḥ|

yacchraddhayā yajed viṣṇuṃ sarvayajñeśvaraṃ makhaiḥ|| 35

अर्थ

‘कर्मोंके द्वारा कर्मवासनाओं और कर्मफलोंका आत्यन्तिक नाश करनेका सबसे अच्छा उपाय यह है कि यज्ञ आदिके द्वारा समस्त यज्ञोंके अधिपति भगवान् विष्णुकी श्रद्धा-पूर्वक आराधना करे॥ ३५॥

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