श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तं क्लेशकर्मपरिपाकगुणप्रवाहै-

रव्याहतानुभवमीश्‍वरमद्वितीयम् ।

प्राणादिभिः स्वविभवैरुपगूढमन्यो

मन्येत सूर्यमिव मेघहिमोपरागैः॥ ३३

taṃ kleśakarmaparipākaguṇapravāhai-

ravyāhatānubhavamīśvaramadvitīyam |

prāṇādibhiḥ svavibhavairupagūḍhamanyo

manyeta sūryamiva meghahimoparāgaiḥ|| 33

अर्थ

उनका ज्ञानमय स्वरूप अविद्या, राग-द्वेष आदि क्लेश, पुण्य-पापमय कर्म, सुख-दुःखादि कर्मफल तथा सत्त्व आदि गुणोंके प्रवाहसे खण्डित नहीं है। वे स्वयं अद्वितीय परमात्मा हैं। जब वे अपनेको अपनी ही शक्तियों—प्राण आदिसे ढक लेते हैं, तब मूर्खलोग ऐसा समझते हैं कि वे ढक गये; जैसे बादल, कुहरा या ग्रहणके द्वारा अपने नेत्रोंके ढक जानेपर सूर्यको ढका हुआ मान लेते हैं॥ ३३॥

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