श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वसुदेवजीका यज्ञोत्सव

श्रीशुक उवाच

श्रुत्वा पृथा सुबलपुत्र्यथ याज्ञसेनी ✎ 2136

माधव्यथ क्षितिपपत्‍न्य उत स्वगोप्यः।

कृष्णेऽखिलात्मनि हरौ प्रणयानुबन्धं

सर्वा विसिस्म्युरलमश्रुकलाकुलाक्ष्यः॥ १

śrutvā pṛthā subalaputryatha yājñasenī

mādhavyatha kṣitipapatnya uta svagopyaḥ|

kṛṣṇe'khilātmani harau praṇayānubandhaṃ

sarvā visismyuralamaśrukalākulākṣyaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सर्वात्मा भक्तभयहारी भगवान् श्रीकृष्णके प्रति उनकी पत्‍नियोंका कितना प्रेम है—यह बात कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, दूसरी राजपत्‍नियों और भगवान्‌की प्रियतमा गोपियोंने भी सुनी। सब-की-सब उनका यह अलौकिक प्रेम देखकर अत्यन्त मुग्ध, अत्यन्त विस्मित हो गयीं। सबके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये॥ १॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2136 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): लपुत्रॺथ या → लपुत्र्यथ या

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