श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

महिष्य ऊचुः

भौमं निहत्य सगणं युधि तेन रुद्धा

ज्ञात्वाथ नः क्षितिजये जितराजकन्याः।

निर्मुच्य संसृतिविमोक्षमनुस्मरन्तीः

पादाम्बुजं परिणिनाय य आप्तकामः॥ ४०

bhaumaṃ nihatya sagaṇaṃ yudhi tena ruddhā

jñātvātha naḥ kṣitijaye jitarājakanyāḥ|

nirmucya saṃsṛtivimokṣamanusmarantīḥ

pādāmbujaṃ pariṇināya ya āptakāmaḥ|| 40

अर्थ

सोलह हजार पत्‍नियोंकी ओरसे रोहिणीजीने कहा—भौमासुरने दिग्विजयके समय बहुत-से राजाओंको जीतकर उनकी कन्या हमलोगोंको अपने महलमें बंदी बना रखा था। भगवान्‌ने यह जानकर युद्धमें भौमासुर और उसकी सेनाका संहार कर डाला और स्वयं पूर्णकाम होनेपर भी उन्होंने हमलोगोंको वहाँसे छुड़ाया तथा पाणिग्रहण करके अपनी दासी बना लिया। रानीजी! हम सदा-सर्वदा उनके उन्हीं चरणकमलोंका चिन्तन करती रहती थीं, जो जन्म-मृत्युरूप संसारसे मुक्त करनेवाले हैं॥ ४०॥

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