॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.37
पिता मे पूजयामास सुहृत्सम्बन्धिबान्धवान्।
महार्हवासोऽलंकारैः शय्यासनपरिच्छदैः॥ ३७
pitā me pūjayāmāsa suhṛtsambandhibāndhavān|
mahārhavāso'laṃkāraiḥ śayyāsanaparicchadaiḥ|| 37
अर्थ
मेरी अभिलाषा पूर्ण हो जानेसे पिताजीको बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने हितैषी-सुहृदों, सगे-सम्बन्धियों और भाई-बन्धुओंको बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, शय्या, आसन और विविध प्रकारकी सामग्रियाँ देकर सम्मानित किया॥ ३७॥