श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

ततः पुरीं यदुपतिरत्यलंकृतां

रविच्छदध्वजपटचित्रतोरणाम् ।

कुशस्थलीं दिवि भुवि चाभिसंस्१तुतां

समाविशत्तरणिरिव स्वकेतनम्॥ ३६

tataḥ purīṃ yadupatiratyalaṃkṛtāṃ

ravicchadadhvajapaṭacitratoraṇām |

kuśasthalīṃ divi bhuvi cābhisaṃstutāṃ

samāviśattaraṇiriva svaketanam|| 36

अर्थ

तदनन्तर यदुवंशशिरोमणि भगवान्‌ने सूर्यकी भाँति अपने निवासस्थान स्वर्ग और पृथ्वीमें सर्वत्र प्रशंसित द्वारका-नगरीमें प्रवेश किया। उस दिन वह विशेषरूपसे सजायी गयी थी। इतनी झंडियाँ, पताकाएँ और तोरण लगाये गये थे कि उनके कारण सूर्यका प्रकाश धरतीतक नहीं आ पाता था॥ ३६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    सम्मतां।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 642)

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