श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

एवं वृते भगवति म१येशे नृपयूथपाः।

न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हृच्छयातुराः॥ ३१

evaṃ vṛte bhagavati mayeśe nṛpayūthapāḥ|

na sehire yājñaseni spardhanto hṛcchayāturāḥ|| 31

अर्थ

द्रौपदीजी! जब मैंने इस प्रकार अपने स्वामी प्रियतम भगवान्‌को वरमाला पहना दी, उन्हें वरण कर लिया, तब कामातुर राजाओंको बड़ा डाह हुआ। वे बहुत ही चिढ़ गये॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    मयेमे।

    (मुद्रित पृष्ठ 641)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें