श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

मित्रविन्दोवाच

यो मां स्वयंवर उपेत्य विजित्य भूपान्

निन्ये श्‍वयूथगमिवात्मबलिं द्विपारिः।

भ्रातॄंश्‍च मेऽपकुरुतः स्वपुरं श्रियौक-

स्तस्यास्तु मेऽनुभवमङ्‌घ्र्यवनेजनत्वम्॥ १२✎ 2133

yo māṃ svayaṃvara upetya vijitya bhūpān

ninye śvayūthagamivātmabaliṃ dvipāriḥ|

bhrātṝṃśca me'pakurutaḥ svapuraṃ śriyauka-

stasyāstu me'nubhavamaṅghryavanejanatvam|| 12

अर्थ

मित्रविन्दाने कहा—द्रौपदीजी! मेरा स्वयंवर हो रहा था। वहाँ आकर भगवान्‌ने सब राजाओंको जीत लिया और जैसे सिंह झुंड-के-झुंड कुत्तोंमेंसे अपना भाग ले जाय, वैसे ही मुझे अपनी शोभामयी द्वारकापुरीमें ले आये। मेरे भाइयोंने भी मुझे भगवान्‌से छुड़ाकर मेरा अपकार करना चाहा, परन्तु उन्होंने उन्हें भी नीचा दिखा दिया। मैं ऐसा चाहती हूँ कि मुझे जन्म-जन्म उनके पाँव पखारनेका सौभाग्य प्राप्त होता रहे॥ १२॥✎ 895 1715

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #895 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1715 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें
  • #2133 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺवनेज → ङ्‌घ्र्यवनेज

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