श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

कालिन्द्युवाच

तपश्‍चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया।

सख्योपेत्याग्रहीत् पाणिं योऽहं तद‍्गृहमार्जनी॥ ११

tapaścarantīmājñāya svapādasparśanāśayā|

sakhyopetyāgrahīt pāṇiṃ yo'haṃ tadgṛhamārjanī|| 11

अर्थ

कालिन्दीने कहा—द्रौपदीजी! जब भगवान्‌को यह मालूम हुआ कि मैं उनके चरणोंका स्पर्श करनेकी आशा-अभिलाषासे तपस्या कर रही हूँ, तब वे अपने सखा अर्जुनके साथ यमुना-तटपर आये और मुझे स्वीकार कर लिया। मैं उनका घर बुहारनेवाली उनकी दासी हूँ॥ ११॥

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