कालिन्दीने कहा—द्रौपदीजी! जब भगवान्को यह मालूम हुआ कि मैं उनके चरणोंका स्पर्श करनेकी आशा-अभिलाषासे तपस्या कर रही हूँ, तब वे अपने सखा अर्जुनके साथ यमुना-तटपर आये और मुझे स्वीकार कर लिया। मैं उनका घर बुहारनेवाली उनकी दासी हूँ॥ ११॥
तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया।
सख्योपेत्याग्रहीत् पाणिं योऽहं तद्गृहमार्जनी॥ ११
कालिन्दीने कहा—द्रौपदीजी! जब भगवान्को यह मालूम हुआ कि मैं उनके चरणोंका स्पर्श करनेकी आशा-अभिलाषासे तपस्या कर रही हूँ, तब वे अपने सखा अर्जुनके साथ यमुना-तटपर आये और मुझे स्वीकार कर लिया। मैं उनका घर बुहारनेवाली उनकी दासी हूँ॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 638) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/11/