श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्‍वरीम्।

स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः॥ ३७

rohiṇī devakī cātha pariṣvajya vrajeśvarīm|

smarantyau tatkṛtāṃ maitrīṃ bāṣpakaṇṭhyau samūcatuḥ|| 37

अर्थ

रोहिणी और देवकीजीने व्रजेश्‍वरी यशोदाको अपनी अँकवारमें भर लिया। यशोदाजीने उन लोगोंके साथ मित्रताका जो व्यवहार किया था, उसका स्मरण करके दोनोंका गला भर आया। वे यशोदाजीसे कहने लगीं—॥ ३७॥

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