श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

पृथा भ्रातॄन् स्वसॄर्वीक्ष्य तत्पुत्रान् पितरावपि।✎ 1194

भ्रातृपत्‍नीर्मुकुन्दं च जहौ संकथया शुचः॥ १८

pṛthā bhrātṝn svasṝrvīkṣya tatputrān pitarāvapi|

bhrātṛpatnīrmukundaṃ ca jahau saṃkathayā śucaḥ|| 18

अर्थ

परीक्षित्! कुन्ती वसुदेव आदि अपने भाइयों, बहिनों, उनके पुत्रों, माता-पिता, भाभियों और भगवान् श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना सारा दुःख भूल गयीं॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1194 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वसृर्वीक्ष्य → स्वसॄर्वीक्ष्य

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