श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

तस्यैव मे सौहृदसख्यमैत्री दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात्।

महानुभावेन गुणालयेन विषज्जतस्तत्पुरुषप्रसंगः ॥ ३६

tasyaiva me sauhṛdasakhyamaitrī dāsyaṃ punarjanmani janmani syāt|

mahānubhāvena guṇālayena viṣajjatastatpuruṣaprasaṃgaḥ || 36

अर्थ

मुझे जन्म-जन्म उन्हींका प्रेम, उन्हींकी हितैषिता, उन्हींकी मित्रता और उन्हींकी सेवा प्राप्त हो। मुझे सम्पत्तिकी आवश्यकता नहीं, सदा-सर्वदा उन्हीं गुणोंके एकमात्र निवासस्थान महानुभाव भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग बढ़ता जाय और उन्हींके प्रेमी भक्तोंका सत्संग प्राप्त हो॥ ३६॥

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