श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

किंचित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी।

मयोपनीतां पृथुकैकमुष्टिं प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा॥ ३५

kiṃcitkarotyurvapi yat svadattaṃ suhṛtkṛtaṃ phalgvapi bhūrikārī|

mayopanītāṃ pṛthukaikamuṣṭiṃ pratyagrahīt prītiyuto mahātmā|| 35

अर्थ

मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैं बहुत, पर उसे मानते हैं बहुत थोड़ा! और उनका प्रेमी भक्त यदि उनके लिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको बहुत मान लेते हैं। देखो तो सही! मैंने उन्हें केवल एक मुट्ठी चिउड़ा भेंट किया था, पर उदारशिरोमणि श्रीकृष्णने उसे कितने प्रेमसे स्वीकार किया॥ ३५॥

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