॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.45
यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो।
श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम्॥ ४५
yasyacchandomayaṃ brahma deha āvapanaṃ vibho|
śreyasāṃ tasya guruṣu vāso'tyantaviḍambanam|| 45
अर्थ
प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर। वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य-लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है?॥ ४५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
श्रीदामचरितेऽशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥