॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.20
अथोपवेश्य पर्यंके स्वयं सख्युः समर्हणम्।
उपहृत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनीः॥ २०
athopaveśya paryaṃke svayaṃ sakhyuḥ samarhaṇam|
upahṛtyāvanijyāsya pādau pādāvanejanīḥ|| 20
अर्थ
परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की। प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया॥ २०-२१॥