इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन चिउड़ोंको लेकर द्वारकाके लिये चल पड़े। वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’॥ १५॥
स तानादाय विप्राग्र्यः प्रययौ द्वारकां किल।
कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन्॥ १५
इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन चिउड़ोंको लेकर द्वारकाके लिये चल पड़े। वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 621) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/15/