श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

द्रोणो वसूनां प्रवरो धरया सह भार्यया।

करिष्यमाण आदेशान् ब्रह्मणस्तमुवाच ह॥ ४८

droṇo vasūnāṃ pravaro dharayā saha bhāryayā|

kariṣyamāṇa ādeśān brahmaṇastamuvāca ha|| 48

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! नन्दबाबा पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ वसु थे। उनका नाम था द्रोण और उनकी पत्‍नीका नाम था धरा। उन्होंने ब्रह्माजीके आदेशोंका पालन करनेकी इच्छासे उनसे कहा—॥ ४८॥

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