॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.47
पितरौ नान्वविन्देतां कृष्णोदारार्भकेहितम्।
गायन्त्यद्यापि कवयो यल्लोकशमलापहम्॥ ४७
pitarau nānvavindetāṃ kṛṣṇodārārbhakehitam|
gāyantyadyāpi kavayo yallokaśamalāpaham|| 47
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णकी वे बाल-लीलाएँ, जो वे अपने ऐश्वर्य और महत्ता आदिको छिपाकर ग्वालबालोंमें करते हैं, इतनी पवित्र हैं कि उनका श्रवण-कीर्तन करनेवाले लोगोंके भी सारे पाप-ताप शान्त हो जाते हैं। त्रिकालदर्शी ज्ञानी पुरुष आज भी उनका गान करते रहते हैं । वे ही लीलाएँ उनके जन्मदाता माता-पिता देवकी-वसुदेवजीको तो देखनेतकको न मिलीं और नन्द-यशोदा उनका अपार सुख लूट रहे हैं । इसका क्या कारण है?॥ ४७॥