यशोदाजीने कहा—‘अच्छी बात। यदि ऐसा है, तो मुँह खोल।’ माताके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपना मुँह खोल दिया*। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अनन्त है। वे केवल लीलाके लिये ही मनुष्यके बालक बने हुए हैं॥ ३६॥✎ 1408
यद्येवं तर्हि व्यादेहीत्युक्तः स भगवान् हरिः।
व्यादत्ताव्याहतैश्वर्यः क्रीडामनुजबालकः॥ ३६
यशोदाजीने कहा—‘अच्छी बात। यदि ऐसा है, तो मुँह खोल।’ माताके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपना मुँह खोल दिया। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अनन्त है। वे केवल लीलाके लिये ही मनुष्यके बालक बने हुए हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 179) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/36/
टिप्पणियाँ
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१—मा! मिट्टी खानेके सम्बन्धमें ये मुझ अकेलेका ही नाम ले रहे हैं। मैंने खायी, तो सबने खायी, देख लो मेरे मुखमें सम्पूर्ण विश्व!
२-श्रीकृष्णने विचार किया कि उस दिन मेरे मुखमें विश्व देखकर माताने अपने नेत्र बंद कर लिये थे। आज भी जब मैं अपना मुँह खोलूँगा, तब यह अपने नेत्र बंद कर लेगी। इस विचारसे मुख खोल दिया।