श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.79.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 79 · अथैकोनाशीतितमोऽध्यायः

गोमतीं गण्डकीं स्नात्वा विपाशां शोण आप्लुतः।

गयां गत्वा पितॄनिष्ट्वा गंगासागरसंगमे॥ ११ ✎ 1190

gomatīṃ gaṇḍakīṃ snātvā vipāśāṃ śoṇa āplutaḥ|

gayāṃ gatvā pitṝniṣṭvā gaṃgāsāgarasaṃgame|| 11

अर्थ

वहाँसे गण्डकी, गोमती तथा विपाशा नदियोंमें स्नान करके वे सोननदके तटपर गये और वहाँ स्नान किया। इसके बाद गयामें जाकर पितरोंका वसुदेवजीके आज्ञानुसार पूजन-यजन किया। फिर गंगासागर-संगमपर गये; वहाँ भी स्नान आदि तीर्थ-कृत्योंसे निवृत्त होकर महेन्द्र पर्वतपर गये। वहाँ परशुरामजीका दर्शन और अभिवादन किया। तदनन्तर सप्तगोदावरी, वेणा, पम्पा और भीमरथी आदिमें स्नान करते हुए स्वामिकार्तिकका दर्शन करने गये तथा वहाँसे महादेवजीके निवासस्थान श्रीशैलपर पहुँचे। इसके बाद भगवान् बलरामने द्रविड़ देशके परम पुण्यमय स्थान वेंकटाचल (बालाजी) का दर्शन किया और वहाँसे वे कामाक्षी—शिवकांची, विष्णुकांची होते हुए तथा श्रेष्ठ नदी कावेरीमें स्नान करते हुए पुण्यमय श्रीरंगक्षेत्रमें पहुँचे। श्रीरंगक्षेत्रमें भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहते हैं॥ ११—१४॥

यह अर्थ श्लोक 11–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1190 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृनिष्ट्वा → पितॄनिष्ट्वा

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