श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

त्वं मातुलेयो नः कृष्ण मित्रध्रुङ्मां जिघांससि।

अतस्त्वां गदया मन्द हनिष्ये वज्रकल्पया॥ ५

tvaṃ mātuleyo naḥ kṛṣṇa mitradhruṅmāṃ jighāṃsasi|

atastvāṃ gadayā manda haniṣye vajrakalpayā|| 5

अर्थ

कृष्ण! तुम मेरे मामाके लड़के हो, इसलिये तुम्हें मारना तो नहीं चाहिये; परन्तु एक तो तुमने मेरे मित्रोंको मार डाला है और दूसरे मुझे भी मारना चाहते हो। इसलिये मतिमन्द! आज मैं तुम्हें अपनी वज्रकर्कश गदासे चूर-चूर कर डालूँगा॥ ५॥

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