॥ श्रीहरिः ॥
गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मदः।
दिष्ट्या दिष्ट्या भवानद्य मम दृष्टिपथं गतः॥ ४
gadāmudyamya kārūṣo mukundaṃ prāha durmadaḥ|
diṣṭyā diṣṭyā bhavānadya mama dṛṣṭipathaṃ gataḥ|| 4
अर्थ
घमंडके नशेमें चूर करूषनरेश दन्तवक्त्रने गदा तानकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है कि आज तुम मेरी आँखोंके सामने पड़ गये॥ ४॥
गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मदः।
दिष्ट्या दिष्ट्या भवानद्य मम दृष्टिपथं गतः॥ ४
घमंडके नशेमें चूर करूषनरेश दन्तवक्त्रने गदा तानकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है कि आज तुम मेरी आँखोंके सामने पड़ गये॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.78.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 611) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/78/4/