॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.78.37
किं वः कामो मुनिश्रेष्ठा ब्रूताहं करवाण्यथ।
अजानतस्त्वपचितिं यथा मे चिन्त्यतां बुधाः॥ ३७
kiṃ vaḥ kāmo muniśreṣṭhā brūtāhaṃ karavāṇyatha|
ajānatastvapacitiṃ yathā me cintyatāṃ budhāḥ|| 37
अर्थ
ऋषियो! इसके अतिरिक्त आपलोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये। मैं आपलोगोंकी इच्छा पूर्ण करूँगा। अनजानमें मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्चित्त भी आपलोग सोच-विचारकर बतलाइये; क्योंकि आपलोग इस विषयके विद्वान् हैं॥ ३७॥