श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च।

आशासितं यत्तद् ब्रूत साधये योगमायया॥ ३४

dīrghamāyurbataitasya sattvamindriyameva ca|

āśāsitaṃ yattad brūta sādhaye yogamāyayā|| 34

अर्थ

आपलोग इस सूतको लम्बी आयु, बल, इन्द्रिय-शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे बतला दीजिये; मैं अपने योगबलसे सब कुछ सम्पन्‍न किये देता हूँ॥ ३४॥

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