श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

अदान्तस्याविनीतस्य वृथा पण्डितमानिनः।

न गुणाय भवन्ति स्म नटस्येवाजितात्मनः॥ २६

adāntasyāvinītasya vṛthā paṇḍitamāninaḥ|

na guṇāya bhavanti sma naṭasyevājitātmanaḥ|| 26

अर्थ

भगवान् व्यासदेवका शिष्य होकर इसने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत-से शास्त्रोंका अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मनपर संयम नहीं है। यह विनयी नहीं, उद्दण्ड है। इस अजितात्माने झूठमूठ अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मान रखा है। जैसे नटकी सारी चेष्टाएँ अभिनयमात्र होती हैं, वैसे ही इसका सारा अध्ययन स्वाँगके लिये है। उससे न इसका लाभ है और न किसी दूसरेका॥ २५-२६॥

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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