श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्वणांजलिम्।

अध्यासीनं च तान् विप्रांश्‍चुकोपोद्वीक्ष्य माधवः॥ २३

apratyutthāyinaṃ sūtamakṛtaprahvaṇāṃjalim|

adhyāsīnaṃ ca tān viprāṃścukopodvīkṣya mādhavaḥ|| 23

अर्थ

बलरामजीने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जातिमें उत्पन्‍न होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऊँचे आसनपर बैठे हुए हैं और उनके आनेपर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया॥ २३॥

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