॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.53
दुर्योधनमृते पापं कलिं कुरुकुलामयम्।
यो न सेहे श्रियं स्फीतां दृष्ट्वा पाण्डुसुतस्य ताम्॥ ५३
duryodhanamṛte pāpaṃ kaliṃ kurukulāmayam|
yo na sehe śriyaṃ sphītāṃ dṛṣṭvā pāṇḍusutasya tām|| 53
अर्थ
परीक्षित्! सब तो सुखी हुए, परन्तु दुर्योधनसे पाण्डवोंकी यह उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीका उत्कर्ष सहन न हुआ। क्योंकि वह स्वभावसे ही पापी, कलहप्रेमी और कुरुकुलका नाश करनेके लिये एक महान् रोग था॥ ५३॥