श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

राजसूयावभृथ्येन स्नातो राजा युधिष्ठिरः।

ब्रह्मक्षत्रसभामध्ये शुशुभे सुरराडिव॥ ५१

rājasūyāvabhṛthyena snāto rājā yudhiṣṭhiraḥ|

brahmakṣatrasabhāmadhye śuśubhe surarāḍiva|| 51

अर्थ

महाराज युधिष्ठिर राजसूयका यज्ञान्त-स्नान करके ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी सभामें देवराज इन्द्रके समान शोभायमान होने लगे॥ ५१॥

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