श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

एक एवाद्वितीयोऽसावैतदात्म्यमिदं जगत्।

आत्मनाऽऽत्माश्रयः सभ्याः सृजत्यवति हन्त्यजः॥ २१

eka evādvitīyo'sāvaitadātmyamidaṃ jagat|

ātmanā''tmāśrayaḥ sabhyāḥ sṛjatyavati hantyajaḥ|| 21

अर्थ

सभासदो! मैं कहाँतक वर्णन करूँ, भगवान् श्रीकृष्ण वह एकरस अद्वितीय ब्रह्म हैं, जिसमें सजातीय, विजातीय और स्वगतभेद नाममात्रका भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है। वे अपने-आपमें ही स्थित और जन्म, अस्तित्व, वृद्धि आदि छः भावविकारोंसे रहित हैं। वे अपने आत्मस्वरूप संकल्पसे ही जगत‍्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं॥ २१॥

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