श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

यदात्मकमिदं विश्‍वं क्रतवश्‍च यदात्मकाः।

अग्‍निराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्‍च यत्परः॥ २०

yadātmakamidaṃ viśvaṃ kratavaśca yadātmakāḥ|

agnirāhutayo mantrāḥ sāṃkhyaṃ yogaśca yatparaḥ|| 20

अर्थ

यह सारा विश्‍व श्रीकृष्णका ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही अग्‍नि, आहुति और मन्त्रोंके रूपमें हैं। ज्ञानमार्ग और कर्म-मार्ग—ये दोनों भी श्रीकृष्णकी प्राप्तिके ही हेतु हैं॥ २०॥

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