वे दायें-बायें तरह-तरहके पैंतरे बदलते हुए ऐसे शोभायमान हो रहे थे—मानो दो श्रेष्ठ नट रंगमंचपर युद्धका अभिनय कर रहे हों॥ ३५॥
मण्डलानि विचित्राणि सव्यं दक्षिणमेव च।
चरतोः शुशुभे युद्धं नटयोरिव रंगिणोः॥ ३५
वे दायें-बायें तरह-तरहके पैंतरे बदलते हुए ऐसे शोभायमान हो रहे थे—मानो दो श्रेष्ठ नट रंगमंचपर युद्धका अभिनय कर रहे हों॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 584) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/72/35/