श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

राजन् विद्ध्यतिथीन् प्राप्तानर्थिनो दूरमागतान्।

तन्‍नः प्रयच्छ भद्रं ते यद् वयं कामयामहे॥ १८

rājan viddhyatithīn prāptānarthino dūramāgatān|

tannaḥ prayaccha bhadraṃ te yad vayaṃ kāmayāmahe|| 18

अर्थ

‘राजन्! आपका कल्याण हो। हम तीनों आपके अतिथि हैं और बहुत दूरसे आ रहे हैं। अवश्य ही हम यहाँ किसी विशेष प्रयोजनसे ही आये हैं। इसलिये हम आपसे जो कुछ चाहते हैं, वह आप हमें अवश्य दीजिये॥ १८॥

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