श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

मृदंगशंखपटहवीणापणवगोमुखैः ।

ब्राह्मणाश्‍चारविन्दाक्षं तुष्टुवुर्ननृतुर्जगुः॥ ३०

mṛdaṃgaśaṃkhapaṭahavīṇāpaṇavagomukhaiḥ |

brāhmaṇāścāravindākṣaṃ tuṣṭuvurnanṛturjaguḥ|| 30

अर्थ

कुरु, सृंजय और केकय देशके नरपतियोंने भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया और भगवान् श्रीकृष्णने भी उनका यथोचित सत्कार किया। सूत, मागध, वंदीजन और ब्राह्मण भगवान्‌की स्तुति करने लगे तथा गन्धर्व, नट, विदूषक आदि मृदंग, शंख, नगारे, वीणा, ढोल और नरसिंगे बजा-बजाकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको प्रसन्‍न करनेके लिये नाचने-गाने लगे॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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