श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

बलं बृहद्ध्वजपटछत्रचामरै-

र्वरायुधाभरणकिरीटवर्मभिः ।

दिवांशुभिस्तुमुलरवं बभौ रवे-

र्यथार्णवः क्षुभिततिमिंगिलोर्मिभिः॥ १७

balaṃ bṛhaddhvajapaṭachatracāmarai-

rvarāyudhābharaṇakirīṭavarmabhiḥ |

divāṃśubhistumularavaṃ babhau rave-

ryathārṇavaḥ kṣubhitatimiṃgilormibhiḥ|| 17

अर्थ

जैसे मगरमच्छों और लहरोंकी उछल-कूदसे क्षुब्ध समुद्रकी शोभा होती है, ठीक वैसे ही अत्यन्त कोलाहलसे परिपूर्ण, फहराती हुई बड़ी-बड़ी पताकाओं, छत्रों, चँवरों, श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्रों, वस्त्राभूषणों, मुकुटों, कवचों और दिनके समय उनपर पड़ती हुई सूर्यकी किरणोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी सेना अत्यन्त शोभायमान हुई॥ १७॥✎ 2129

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2129 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें