श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

यस्यामलं दिवि यशः प्रथितं रसायां

भूमौ च ते भुवनमंगल दिग्वितानम्।

मन्दाकिनीति दिवि भोगवतीति चाधो

गंगेति चेह चरणाम्बु पुनाति विश्‍वम्॥ ४४

yasyāmalaṃ divi yaśaḥ prathitaṃ rasāyāṃ

bhūmau ca te bhuvanamaṃgala digvitānam|

mandākinīti divi bhogavatīti cādho

gaṃgeti ceha caraṇāmbu punāti viśvam|| 44

अर्थ

त्रिभुवन-मंगल! आपकी निर्मल कीर्ति समस्त दिशाओंमें छा रही है तथा स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें व्याप्त हो रही है; ठीक वैसे ही, जैसे आपकी चरणामृतधारा स्वर्गमें मन्दाकिनी, पातालमें भोगवती और मर्त्यलोकमें गंगाके नामसे प्रवाहित होकर सारे विश्‍वको पवित्र कर रही है॥ ४४॥✎ 2128

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