श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

श्रवणात् कीर्तनाद् ध्यानात् पूयन्तेऽन्तेवसायिनः।

तव ब्रह्ममयस्येश किमुतेक्षाभिमर्शिनः॥ ४३

śravaṇāt kīrtanād dhyānāt pūyante'ntevasāyinaḥ|

tava brahmamayasyeśa kimutekṣābhimarśinaḥ|| 43

अर्थ

प्रभो! आप स्वयं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हैं। आपके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेमात्रसे अन्त्यज भी पवित्र हो जाते हैं। फिर जो आपका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ४३॥✎ 2128

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2128 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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