॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.70.11
आत्मानं भूषयामास नरलोकविभूषणम्।
वासोभिर्भूषणैः स्वीयैर्दिव्यस्रगनुलेपनैः॥ ११
ātmānaṃ bhūṣayāmāsa naralokavibhūṣaṇam|
vāsobhirbhūṣaṇaiḥ svīyairdivyasraganulepanaiḥ|| 11
अर्थ
परीक्षित्! यद्यपि भगवान्के शरीरका सहज सौन्दर्य ही मनुष्य-लोकका अलंकार है, फिर भी वे अपने पीताम्बरादि दिव्य वस्त्र, कौस्तुभादि आभूषण, पुष्पोंके हार और चन्दनादि दिव्य अंगरागसे अपनेको आभूषित करते॥ ११॥